आरएसएस सुप्रिमो मोहन भागवत का संदेश स्वागतेय क्यों है! – प्रोफ़ेसर जसीम मोहम्मद

ऐसा समाज, जहाँ आजकल धर्म, पहचान और अपनापन जैसे मुद्दे अक्सर राजनीतिक बहसों में उलझ जाते हैं, वहीं न्यूयॉर्क में आरएसएस सुप्रिमो डॉ. मोहनजी राव भागवत की हालिया बातें कुछ ऐसे महत्वपूर्ण विचार सामने लाती हैं, जिन पर आज खुले मन से सोचने की ज़रूरत है। धार्मिक सद्भाव, मानवीय गरिमा और समानता के आधार पर सम्मान, पर उनका ज़ोर इस बात की याद दिलाता है कि विविधता और सांस्कृतिक बहुलता भारत के सामाजिक चरित्र का अभिन्न हिस्सा है। उनकी महत्त्वपूर्ण बातें उन व्यापक मानवीय मूल्यों को समझने का अवसर देती हैं, जिन्हें वे स्पष्ट रूप से बता रहे थे। उनके संदेश का एक अहम पहलू उनका यह साफ़ कहना था कि किसी भी समुदाय को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि भारत में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। मुसलमानों के नज़रिए से ‘हिंदू राष्ट्र’ के विचार का क्या मतलब होगा, इस सवाल के जवाब में उन्होंने साफ़ किया कि मुसलमानों को देश से बाहर निकालना हिंदुत्व के अनुरूप नहीं है। यह एक ज़रूरी स्पष्टीकरण है, क्योंकि यह सीधे तौर पर उस चिंता को दूर करता है, जो अक्सर हिंदू पहचान और राष्ट्रवाद के बारे में सार्वजनिक चर्चाओं में उठती है।
हर इंसान की अपनी गरिमा होती है – यह विचार शायद इस सोच का सबसे मज़बूत पहलू है। इंसानों के बीच कोई बुनियादी फ़र्क न होने पर ज़ोर देना सामाजिक सद्भाव के लिए एक सरल, लेकिन गहरी नींव है। भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से विविधतापूर्ण देश में, जहाँ लोग अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आते हैं, ऐसी समझ समुदायों के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर सकती है। उनका यह कहना कि सभी रास्ते आख़िरकार हमें एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं, आध्यात्मिकता की उनकी समावेशी समझ को दर्शाता है। भारत की सभ्यता कभी भी किसी एक संकीर्ण धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रही है। इसके इतिहास में अलग-अलग दार्शनिक विचारधाराओं, धर्मों और रीति-रिवाजों को एक साथ सामंजस्य के साथ रहते हुए देखा गया है। इस विविधता को स्वीकार करने से ऐसा समाज बनाने में सहायता मिल सकती है, जहाँ लोगों को किसी अन्य की पहचान का सम्मान करने के लिए अपनी पहचान छोड़ने की आवश्यकता ही न पड़े।
यहाँ विशेष रूप से ध्यान देनेवाली बात यह थी कि अगर कोई व्यक्ति, जो खुद को हिंदू बताता है, यह मानता है कि भारत में मुसलमानों का कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए, तो ऐसा व्यक्ति हिंदुत्व की मूल भावना से दूर जा रहा है। यह एक मज़बूत नैतिक विचार है। यह लोगों पर ज़िम्मेदारी डालता है कि वे यह सुनिश्चित करें कि अपनी परंपरा के विषय में उनकी समझ नफ़रत या अलगाव का बहाना न बने। ऐसे नज़रिए की तारीफ़ होनी चाहिए, क्योंकि यह सांप्रदायिक दुश्मनी को उसकी जड़ से ही नकारता है। सन् 1996 ई. में दादरी में आसमान में हुई टक्कर के बाद पीड़ितों की सहायता करने वाले आरएसएस के स्वयंसेवकों का उदाहरण इस दर्शन को एक व्यावहारिक स्वरूप भी देता है। न्यूयॉर्क में बताई गई घटना के अनुसार, वॉलंटियर्स घटनास्थल पर पहुँचे, घायलों की मदद की, शवों को निकाला और बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अंतिम संस्कार में उनकी सहायता की। इस तरह के उदाहरण का महत्व इसी बात में है कि किसी धार्मिक पहचान से ऊपर इंसानियत को रखा गया।
इस सिद्धांत को बताना और कहना आसान है, लेकिन इसे व्यवहार में लाना बहुत कठिन है। दुख, डर और उलझन के पलों में लोग स्वाभाविक रूप से अपनी जानी-पहचानी धार्मिक पहचान की ओर लौट सकते हैं। किसी दूसरे इंसान की सहायता करना, बिना यह पूछे कि वह किस धर्म का है, गहरी सहानुभूति की माँग करता है। इसलिए, यह उदाहरण दिखाता है कि सामाजिक सद्भाव का विचार तभी सार्थक हो सकता है, जब उसे असल काम में बदला जाए। एक और महत्वपूर्ण बात थी – बिना किसी निजी फायदे की उम्मीद के सेवा करना। लगातार पहचान या प्रचार की अपेक्षा के बिना समाज की सेवा करने का विचार एक पुराने भारतीय नैतिक आदर्श को दर्शाता है। सच्ची सेवा तब होती है, जब सहायता करनेवाला व्यक्ति यह हिसाब नहीं लगाता कि उसे बदले में क्या मिलेगा। निस्वार्थ योगदान की वह भावना सामाजिक भरोसे को उस तरह से मजबूत कर सकती है, जैसा कि राजनीतिक बहसें कभी नहीं कर सकतीं।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से हटकर यहाँ मानवीय रिश्तों पर चर्चा को वापस लाना भी एक सुखद बदलाव है। धार्मिक समुदाय कोई अमूर्त श्रेणियाँ नहीं हैं; वे परिवारों, पड़ोसियों, सहकर्मियों, छात्रों, कामगारों और दोस्तों से मिलकर बनते हैं, जो एक-दूसरे के साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीते हैं। किसी देश की सेहत आखिरकार इस बात पर निर्भर करती है कि ये आम रिश्ते कैसे काम करते हैं। ऐसा सोच जो लोगों को एक-दूसरे को सबसे पहले साथी इंसान के तौर पर देखने के लिए प्रेरित करता है, इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
भारत की शक्ति और क्षमता सदैव अलग-अलग तरह के लोगों को एक साथ लेकर चलने की रही है, बिना इस बात पर ज़ोर दिए कि सब एक जैसे ही हों। देश का सामाजिक ताना-बाना बहुत विविधतापूर्ण है, बावजूद इसके लाखों लोग एक ही पड़ोस, कार्यस्थल, शिक्षण संस्थान और सार्वजनिक जगहों पर साथ रहते हैं। समानता के आधार पर सम्मान के प्रति सकारात्मक ज़ोर देना इस असलियत के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाता है। यह नागरिकों को याद दिलाता है कि विविधता का मतलब बँटवारा नहीं, बल्कि सामंजस्य और सहअस्तित्व होना चाहिए।
इन बातों पर ध्यान देना इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि ये बातें हर सवाल को टकराव के नज़रिए से देखने की आदत को चुनौती देती हैं। हिंदू पहचान और मुस्लिम पहचान को एक-दूसरे का जानी दुश्मन नहीं दिखाया जाना चाहिए। एक आत्मविश्वास से भरी सभ्यतागत पहचान को दूसरों का सम्मान करने में सक्षम होना चाहिए, बिना उनकी मौजूदगी से ख़तरा महसूस किए। वह आत्मविश्वास डर पर आधारित सोच की तुलना में कहीं अधिक रचनात्मक होता है या अलग-थलग करने की सोच।
बहुत से लोगों के लिए, सबसे राहत देनेवाली बात यह है कि इस विचार को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया गया है कि मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। आरएसएस या उसकी विचारधारा को लेकर चाहे कैसी भी राजनीतिक बहसें हों, यह बात एकदम साफ़ है और इसे ग़लत समझने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह भारतीय मुसलमानों को बाहरी मानने के बजाय, उन्हें एक ऐसे वृहद समुदाय का राष्ट्रीय हिस्सा मानता है, जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता है।
इसके साथ ही, ‘भारत’ पर ज़ोर देना भी अहम है, क्योंकि यह राष्ट्रीय पहचान को राजनीतिक सीमाओं के बजाय सभ्यता से जुड़ी समझ से जोड़ता है। यह शब्द करोड़ों भारतीयों के लिए भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व रखता है। जब भारत के इस सोच को मानवीय गरिमा और बराबरी के एहसास के साथ जोड़ा जाता है, तब यह भाव और विचार लोगों को अलग-थलग करने के बजाय राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन सकता है।
मुश्किल समय में सेवा करने का काम एक और अहम सिद्धांत को भी उजागर करता है। किसी संगठन या विचारधारा की असली परीक्षा सिर्फ़ इस बात से नहीं होती कि वह क्या कहती है, बल्कि इस बात से होती है कि ज़रूरत पड़ने पर उसके सदस्य क्या करते हैं। दुख से जूझ रहे लोगों को वैचारिक बहस की नहीं, बल्कि सहायता की आवश्यकता होती है। पीड़ितों का साथ देने की इच्छा, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, करुणा और सहानुभूति पर आधारित देशभक्ति का एक रूप है।
इसलिए, इन बातों को तुरंत वाम-दक्षिण, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक या समर्थक-आलोचक जैसे जाने-पहचाने राजनीतिक खाँचों में बांटने के बजाय, इनके मानवीय पहलू को समझना ज़्यादा ज़रूरी है। सार्वजनिक हस्तियों की आलोचनात्मक जाँच हो सकती है और होनी भी चाहिए, लेकिन हर गंभीर बयान का मूल्यांकन उन मूल्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, जिन्हें वह असल में ज़ाहिर करता है। इस मामले में, सद्भाव, गरिमा, साथ मिलकर रहने और सेवा पर ज़ोर देना बातचीत के लिए एक सकारात्मक आधार देता है।
यह बड़ा संदेश खासकर युवा पीढ़ी के लिए अहम है। भारत का भविष्य सिर्फ़ सरकारें, संस्थाएँ और राजनीतिक पार्टियाँ ही तय नहीं करेंगी; यह इस बात से तय होगा कि युवा भारतीय एक-दूसरे को कैसे समझते हैं। अगर वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़े रहते हुए भी अलग-अलग धर्मों का सम्मान करना सीख जाएँ, तो देश कहीं एक ज़्यादा आत्मविश्वास से भरे और सद्भावपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकता है। यह सिद्धांत कि अपनी पहचान के लिए दूसरों से नफ़रत करने की ज़रूरत नहीं है, एक बहुत ही कीमती सबक़ है।
आखिरकार, न्यूयॉर्क में आरएसएस सुप्रिमो की कही गई बातें हमें यह याद दिलाती हैं कि राष्ट्रवाद को दूसरों को अलग-थलग करने के नज़रिए से परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं है और धार्मिक पहचान दुश्मनी की वजह नहीं बननी चाहिए। मानवीय गरिमा पर ज़ोर और मुसलमानों के साथ भेदभाव को ख़ारिज करना भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसमें सेवा और साथ मिलकर रहना, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ चल सकते हैं। यह एक ऐसा संदेश है, जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए और जिसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए, खासकर ऐसे दौर में जब सार्वजनिक बहसें बहुत आसानी से बँटवारे को हवा देकर अलगाव का रूप ले लेती हैं। सबसे ख़ास बात है इसके पीछे की सरल सोच: कोई व्यक्ति अपनी परंपराओं से मजबूती से जुड़ा रह सकता है और साथ ही दूसरों के सम्मान और अस्तित्व का भी आदर-सम्मान कर सकता है। यह सिद्धांत किसी देश को कमजोर नहीं करता; बल्कि उसे और मजबूत बना सकता है। मोहन भागवत ने जिस तरह से आपसी मेल-जोल, सेवा और इंसानों की बराबरी पर जोर दिया है, वह तारीफ़ के काबिल है क्योंकि ये ऐसी बातें हैं, जो लोगों को एक-दूसरे के समीप ला सकती हैं। विविधताओं वाले भारत में, आपसी सम्मान की यह भावना न केवल अच्छी है, बल्कि एक आत्मविश्वास से भरे, शांतिपूर्ण और एकजुट समाज के निर्माण के लिए बहुत जरूरी भी है। बहुलतावादी समाज के लिए ऐसे विचार एक सकारात्मक सोच के साथ परिपक्व एवं समावेशी धारणा के प्रतीक हैं।

(मुख्य सलाहकार- कस्टोडियन, इंस्टीट्यूट फॉर इस्लामिक एंड क्रॉस-कल्चरल स्टडीज ईमेल: profjasimmd@gmail.com )



