आधुनिककालीन हिंदी साहित्य के इतिहास का पुनर्लेखन आवश्य है : प्रो शंभूनाथ

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ ( सन् 1929 ई.) को प्रकाशित हुए कमोबेश सौ वर्ष होने को हैं, जिसका हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए असंदिग्ध महत्त्व है! साहित्येतिहास लेखन की अनिवार्य शर्तों, कालविभाजन, नामकरण एवं प्रवृत्ति निरूपण, की प्रामाणिक अनुपालना के कारण वह हिंदी साहित्य के आद्यावधि प्रस्तुत किए गए इतिहासों में अद्वितीय एवं अनुपमेय माना जाता है! बावजूद इसके आधुनिककालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों में विगत सौ वर्षों के अंतराल में जो कुछ बदलाव या नयापन आया, उसके कारण उन पर नए सिरे से पुनर्विचार किया जाना हिंदी के आधुनिक साहित्य की अपेक्षा और समय की माँग है। इस नजरिए से हिंदी साहित्य के इतिहास का अद्यतन स्वरूप नि:संदेह व्यापक चर्चा-परिचर्चा और पुनर्विचार की अपेक्षा रखता है!
पिछले दिनों मौलाना आज़ाद नेशनल #उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में हिंदी विभाग के प्रोफेसर प्रो. करनसिंह उटवाल ने मानू के रेडियो/ टीवी स्टूडियो में मेरे साथ ‘हिंदी साहित्य के इतिहास का अद्यतन स्वरूप’ विषय पर एक आत्मीय बातचीत (पॉडकास्ट) की। इस महत्वपूर्ण विषय पर की गई संक्षिप्त बातचीत को आप सुन सकते हैं।
बातचीत का लिंक निचे दिया गया है!
https://youtu.be/iM1bOvdcBOM?si=TZJJl97P2Q8SIX65



