पीओके की पहचान पर उठे सवाल और पाकिस्तान की दोहरी नीति
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इस बार विवाद की वजह पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का वह बयान बना, जिस पर पीओके के वरिष्ठ नेता फासेल मुमताज़ राठौर ने कड़ी आपत्ति जताई। राठौर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पीओके के लोगों को अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी की मान्यता की आवश्यकता नहीं है। उनका यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पाकिस्तान और पीओके के संबंधों पर कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है।
पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर के मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहा है। वह स्वयं को कश्मीरियों का सबसे बड़ा हितैषी और उनके अधिकारों का संरक्षक बताने का दावा करता है। लेकिन जब बात पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों की पहचान, अधिकारों और सम्मान की आती है, तो पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं के बयान अक्सर उसके दावों से मेल खाते दिखाई नहीं देते। यही विरोधाभास इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
फासेल मुमताज़ राठौर का यह कहना कि “हमें अपनी पहचान के लिए किसी की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है”, केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं है। यह उस मानसिकता के विरुद्ध एक राजनीतिक संदेश भी है, जिसमें स्थानीय जनता की पहचान और अस्मिता को सत्ता की सुविधा के अनुसार परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है। किसी भी समाज की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति, परंपरा और जनता से बनती है, न कि किसी मंत्री के बयान से।
यह घटनाक्रम पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर भी नए सवाल खड़े करता है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान वर्षों से कश्मीर के लोगों के अधिकारों की बात करता रहा है, लेकिन जब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों की पहचान और राजनीतिक सम्मान का प्रश्न उठता है, तब उसके नेताओं के बयान बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं। यदि पीओके के लोगों को अपनी पहचान के लिए बार-बार सफाई देनी पड़े या उन्हें बराबरी का दर्जा मिलने पर विवाद खड़ा हो, तो यह पाकिस्तान की आधिकारिक नीति और उसके राजनीतिक दावों के बीच मौजूद विरोधाभास को उजागर करता है। यही कारण है कि इस पूरे विवाद को पाकिस्तान की दोहरी नीति (Double Standards) के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की पहचान पर निर्णय जनता की इच्छा और संवैधानिक व्यवस्था से तय होते हैं, न कि राजनीतिक बयानबाज़ी से। यदि किसी क्षेत्र के लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी पहचान और अधिकार सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर हैं, तो वहां असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है। पीओके से उठी यह आवाज़ इसी असंतोष का संकेत मानी जा सकती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान इस समय आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और प्रांतीय असंतोष जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में पीओके जैसे संवेदनशील क्षेत्र से जुड़े बयान न केवल स्थानीय नेतृत्व और जनता में असहजता पैदा करते हैं, बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
वर्षों से पाकिस्तान दुनिया के सामने यह संदेश देता रहा है कि वह कश्मीरियों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। लेकिन यदि उसके अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र के नेता ही सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान और सम्मान के प्रश्न पर सरकार को चुनौती देने लगें, तो यह स्वाभाविक रूप से उस नैरेटिव की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करता है। किसी भी देश की नीति का मूल्यांकन उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से किया जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान पहले अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं, सम्मान और अधिकारों का ईमानदारी से सम्मान करे। केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाना पर्याप्त नहीं है। यदि पीओके के लोगों को ही अपनी पहचान के लिए आवाज़ उठानी पड़े, तो यह पाकिस्तान की नीतियों पर गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
पीओके में उभरा यह विवाद केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस गहरे अंतर्विरोध की ओर संकेत करता है, जो पाकिस्तान की कश्मीर नीति और उसके व्यवहार के बीच लंबे समय से मौजूद है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान इस असहमति को संवाद के माध्यम से दूर करने का प्रयास करता है या फिर इसे भी महज़ एक राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहने देता है।
वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद फ़ौज़ान




