भारत की आज़ादी के 80 साल पूरे होने पर संवैधानिक मूल्यों पर संगोष्ठी आयोजित होगा; फोकस ‘जेन Z’ को प्रेरित करने पर, पुस्तक विमोचन

पूर्व मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन होंगे मुख्य अतिथि, संविधान, नागरिक कर्तव्यों; आज़ादी के 80वें वर्ष पर नमो अध्ययन केन्द्र का भव्य कार्यक्रम नई दिल्ली में

जैसे-जैसे भारत अपनी आज़ादी के 80वें साल का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा है, सेंटर फॉर नमो स्टडीज़ एवं भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के डॉक्टर अंबेडकर इंटरनेशनल सेन्टर के सहयोग से 12 अगस्त, 2026 को शाम 4:00 बजे डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में “संवैधानिक मूल्य और मौलिक कर्तव्य” विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित करेगा।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के. जी. बालकृष्णन “संवैधानिक मूल्य और मौलिक कर्तव्य” विषय पर मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे। वह संविधान की स्थायी प्रासंगिकता, कानून के शासन, न्यायिक स्वतंत्रता, संवैधानिक नैतिकता और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने में मौलिक कर्तव्यों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बात करेंगे।
भारत की आज़ादी के 80 वर्षों की पृष्ठभूमि में आयोजित यह सेमिनार उन आदर्शों को फिर से स्थापित करने का प्रयास करता है जिन्होंने 1947 से गणतंत्र का मार्गदर्शन किया है और नागरिकों—विशेषकर ‘जेन Z’—को संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
इस कार्यक्रम में डॉ. अनु द्वारा लिखित और पूर्व जस्टिस बी. आर. गवई की प्रस्तावना वाली पुस्तक ‘बियॉन्ड द ब्रीफ: ज्यूरिस्प्रुडेंशियल शिफ्ट्स इन द एपेक्स कोर्ट’ का विमोचन भी किया जाएगा। इस पुस्तक का उद्देश्य महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रमों और संवैधानिक सिद्धांतों को सुलभ और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करके संवैधानिक न्यायशास्त्र और आम नागरिक के बीच की खाई को पाटना है।
सेंटर फॉर नमो स्टडीज़ के मैनेजिंग ट्रस्टी प्रो. जसीम मोहम्मद ने कहा कि भारत की आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ न केवल देश की उपलब्धियों पर, बल्कि उन संवैधानिक मूल्यों पर भी विचार करने का एक महत्वपूर्ण क्षण है जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि ‘जेन Z’ को संवैधानिक साक्षरता और नागरिक जिम्मेदारी की मजबूत भावना से सशक्त बनाना ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को साकार करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस सेमिनार का मकसद युवा भारतीयों को संविधान का सक्रिय संरक्षक बनने और एक मज़बूत, समावेशी और लोकतांत्रिक भारत बनाने में योगदान देने के लिए प्रेरित करना है।
प्रोफ़ेसर जसीम मोहम्मद के अनुसार, जैसे-जैसे भारत अपनी आज़ादी के सफ़र के आठवें दशक में प्रवेश कर रहा है, यह ज़रूरी है कि देश की सबसे बड़ी आबादी—यानी युवा—संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मौलिक अधिकारों के साथ आने वाले कर्तव्यों की गहरी समझ विकसित करें। इस सेमिनार को एक ऐसे मंच के तौर पर तैयार किया गया है जहाँ ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) भारत के लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़े अहम मुद्दों पर जाने-माने कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत कर सके।

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