लोकतांत्रिक दौर में मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी: एक धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी

अलीगढ़, 24 अप्रैल (मोहम्मद कामरान)
तेज़ रफ्तार राजनीतिक बदलाव, सामाजिक विभाजन और नैतिक चुनौतियों के इस दौर में मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी का सवाल बेहद अहम हो गया है। खास तौर पर लोकतांत्रिक समाजों में यह बहस तेज़ हो रही है कि क्या मुसलमानों के लिए राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना सिर्फ एक विकल्प है या इसकी कोई धार्मिक और नैतिक अहमियत भी है।
इन विचारों का इज़हार मशहूर आलिम-ए-दीन मौलाना जमील अहमद क़ासमी ने किया। वह आज मौजूदा हालात पर अपने विचार रख रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान समय में राजनीति धार्मिक तबकों के लिए वर्जित नहीं रही, बल्कि एक जिम्मेदारी का रूप ले चुकी है। यहां तक कि वे वर्ग, जो पहले लोकतंत्र की आलोचना करते थे, आज किसी न किसी रूप में राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल नजर आते हैं।
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, मशविरा (परामर्श), जवाबदेही, न्याय और जनकल्याण जैसे सिद्धांत बेहद महत्वपूर्ण हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी बुनियाद हैं। इस्लामी फिक्ह के मुताबिक मकासिद-ए-शरीअत में जान, ईमान, अक्ल, माल और इज़्ज़त की हिफाज़त शामिल है, और यही तत्व एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि इस्लाम संतुलन और मध्यमार्ग का धर्म है, और यही सिद्धांत सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी लागू होता है। पैगंबर मोहम्मद ﷺ की शिक्षाओं में भी प्रेम, घृणा और सामूहिक मामलों में संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया गया है, ताकि समाज में अशांति न फैले।
क़ुरआन का सिद्धांत “शूरा” (परामर्श) सामूहिक निर्णयों में आपसी सलाह को बढ़ावा देता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम में भागीदारी और मत देने को महत्व प्राप्त है। विशेषज्ञों के अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोट देना एक जिम्मेदाराना कार्य है, जिसे इस्लामी दृष्टिकोण से “गवाही” का एक रूप भी माना जा सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि राजनीतिक प्रक्रिया से पूरी तरह दूरी बनाना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इससे अन्याय को बढ़ावा मिल सकता है, खासकर अल्पसंख्यकों के अधिकार प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत, रचनात्मक और आलोचनात्मक भागीदारी समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
इसके अलावा, इस्लाम सामूहिक भलाई, न्याय और सहानुभूति पर जोर देता है, जिसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत सुधार पर ध्यान दें, बल्कि सामाजिक सुधार में भी सक्रिय भूमिका निभाएं। संवाद, सहिष्णुता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देना भी इसी का हिस्सा है।
मौजूदा दौर में, जब राजनीतिक फैसले मानव गरिमा और सामाजिक सौहार्द पर गहरा असर डालते हैं, तो राजनीतिक भागीदारी सिर्फ एक नागरिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आस्था का व्यावहारिक प्रदर्शन भी बन चुकी है।



