देहरादून स्थित प्रसिद्ध शिक्षाविद्, वैज्ञानिक एवं शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. बी. पी. मैथानी ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा निजी विश्वविद्यालयों पर लगाए जा रहे अत्यधिक एवं मनमाने नियामक नियंत्रण पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

सिक्किम निजी विश्वविद्यालय स्थापना एवं विनियमन अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देहरादून स्थित प्रसिद्ध शिक्षाविद्, वैज्ञानिक एवं शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. बी. पी. मैथानी ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा निजी विश्वविद्यालयों पर लगाए जा रहे अत्यधिक एवं मनमाने नियामक नियंत्रण पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने ऐसे कानूनों को “निष्फल एवं संवैधानिक रूप से अस्थिर अधिनियम” बताया है।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के विधायी हस्तक्षेप उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनिश्चितता उत्पन्न कर रहे हैं तथा देशभर के लाखों विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य और करियर के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
प्रो. मैथानी ने सिक्किम प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ (एस्टैब्लिशमेंट एंड रेग्युलेशन) एक्ट, 2025 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। उनका आरोप है कि यह अधिनियम निजी विश्वविद्यालयों को शासन, शैक्षणिक प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन, नियुक्तियों तथा संस्थागत कार्यप्रणाली जैसे मामलों में व्यापक रूप से राज्य नियंत्रण के अधीन लाने का प्रयास करता है।
याचिका के अनुसार यह कानून वर्तमान विश्वविद्यालयों के पृथक राज्य अधिनियमों को समाप्त कर उन्हें मात्र एक प्रविष्टि के रूप में एकल ढांचे के अंतर्गत लाने का प्रयास करता है, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापित नियामक संरचना के विपरीत है।
उनके अधिवक्ता, मध्य प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता एवं सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अनूप जॉर्ज चौधरी ने कहा कि उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय प्रो. यशपाल बनाम राज्य छत्तीसगढ़ के बावजूद भी सिक्किम राज्य द्वारा ऐसा कानून पारित किया गया।
उन्होंने कहा कि प्रथम दृष्टया यह अधिनियम भारतीय संविधान के विपरीत प्रतीत होता है तथा उच्च शिक्षा से संबंधित विधायी शक्तियों के संवैधानिक वितरण के अनुरूप नहीं है।
डॉ. चौधरी ने आगे बताया कि इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पहले ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जा चुकी है। उन्होंने ऐसे अधिनियमों को “संवैधानिक कलंक” बताया और कहा कि एक ओर राज्य सरकारें उच्च शिक्षा के मानकों के नियमन में केंद्र सरकार एवं UGC के विशिष्ट अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे छात्रों के भविष्य एवं शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता को गंभीर खतरे में डाल रही हैं।
उन्होंने उन प्रावधानों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की जिनके माध्यम से राज्य सरकारें निजी विश्वविद्यालयों पर वार्षिक शुल्क, नियामक फीस तथा छात्रों की फीस आय पर अप्रत्यक्ष प्रतिशत लगाने का प्रयास कर रही हैं, जबकि इन संस्थानों को कोई वित्तीय सहायता या अनुदान प्रदान नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि ऐसे आर्थिक बोझ के कारण विश्वविद्यालयों के व्यय में वृद्धि होती है, जिसका परिणाम अंततः ट्यूशन फीस बढ़ने तथा छात्रों एवं उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक भार के रूप में सामने आता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि निजी विश्वविद्यालय पहले से ही UGC, AICTE तथा अन्य राष्ट्रीय नियामक संस्थाओं द्वारा निर्धारित व्यापक नियमों एवं मानकों का पालन कर रहे हैं। ऐसे में समानांतर राज्य नियंत्रित वित्तीय तंत्र केवल अनावश्यक जटिलताएं एवं नियामक संरचनाओं की पुनरावृत्ति उत्पन्न करते हैं।
याचिका में विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों, UGC अधिनियम, 1956, UGC विनियम, 2003 तथा सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें प्रो. यशपाल बनाम राज्य छत्तीसगढ़, गुजरात विश्वविद्यालय बनाम कृष्ण रंगनाथ मुद्होलकर तथा तमिलनाडु राज्य बनाम अधियामन एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट प्रमुख हैं।
डॉ. चौधरी ने कहा कि उच्च शिक्षा राष्ट्रीय महत्व का विषय है और इसे राज्यों के अतिव्यापी एवं अत्यधिक हस्तक्षेप के अधीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे शैक्षणिक मानकों, संस्थागत स्वायत्तता तथा छात्र कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि प्रो. मैथानी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में किया गया यह हस्तक्षेप पूर्णतः व्यापक जनहित में है तथा इसका उद्देश्य भारत में उच्च शिक्षा को संचालित करने वाले संवैधानिक ढांचे की रक्षा करना है, ताकि नियामक संघर्षों एवं असंवैधानिक विधायी प्रयोगों के कारण छात्रों को नुकसान न उठाना पड़े।

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