मशहूर शायर सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी की याद में चेहल्लुम की मजलिस आयोजित, साहित्यिक व धार्मिक सेवाओं को दी गई श्रद्धांजलि

अलीगढ़, 7 जून। मोहम्मद कामरान
अहलेबैत के मशहूर शायर और उस्ताद-ए-शोअरा मरहूम सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी पुत्र सैयद मुराद हसनैन ज़ैदी के चेहल्लुम और ईसाल-ए-सवाब के अवसर पर कैला नगर स्थित इमामबाड़ा हुसैनिया ज़हरा में एक गरिमामय, आध्यात्मिक और भावनात्मक मजलिस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उलेमा, शायर, अदीब, ज़ाकिर, नौहाख्वां और मोमिनीन ने शिरकत कर मरहूम को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उनकी साहित्यिक, धार्मिक और सामाजिक सेवाओं को याद किया।
मजलिस का शुभारंभ पवित्र कुरआन की तिलावत से हुआ। इसके बाद वक्ताओं ने मरहूम सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी के जीवन, उनकी धार्मिक निष्ठा, साहित्यिक योगदान और अहलेबैत से उनकी गहरी मोहब्बत पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि मरहूम केवल एक प्रतिष्ठित शायर ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपना पूरा जीवन अहलेबैत की शिक्षाओं के प्रचार, उर्दू भाषा एवं साहित्य की सेवा तथा नई पीढ़ी के बौद्धिक और साहित्यिक मार्गदर्शन के लिए समर्पित कर दिया था।
मजलिस को संबोधित करते हुए आयतुल्लाह सैयद अकील अल-ग़रवी के सुपुत्र मौलाना सैयद मोहम्मद सज्जाद अल-ग़रवी (लंदन) ने सूरह यासीन के संदर्भ में अत्यंत विचारोत्तेजक और आध्यात्मिक व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कुरआन मजीद मानवता के लिए संपूर्ण जीवन-पद्धति है और उसकी शिक्षाओं पर अमल करना ही दुनिया और आख़िरत की सफलता का मार्ग है।

मौलाना सज्जाद अल-ग़रवी ने मरहूम सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी की साहित्यिक और धार्मिक सेवाओं को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी लेखनी और विचारों के माध्यम से अहलेबैत की शिक्षाओं को समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शायरी में श्रद्धा, ज्ञान, चिंतन और अहलेबैत की मोहब्बत का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. बसीरुल हसन वफ़ा नक़वी ने किया, जबकि डॉ. मौलाना असगर एजाज़ क़ायमी की देखरेख में पूरी मजलिस सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
इस अवसर पर प्रसिद्ध नौहाख्वां प्रो. महताब हैदर नक़वी और खुर्शीद असरी ने अपने दर्दभरे कलाम पेश कर माहौल को गम और अकीदत से भर दिया। वहीं सैयद नज़र हसनैन ज़ैदी (मुज़फ्फरनगर) की सोज़ख्वानी ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।
वक्ताओं ने मरहूम की साहित्यिक कृतियों “नुक़ूश-ए-मौद्दत” (2004), “कहकशां-ए-मौद्दत” (2012), “फ़ैज़ान-ए-मौद्दत” (2019) तथा प्रकाशनाधीन “इरफ़ान-ए-मौद्दत” का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि ये रचनाएं अहलेबैत की मोहब्बत, नैतिक मूल्यों और मानवीय चरित्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान हैं।
कार्यक्रम के दौरान मरहूम के चुनिंदा अशआर और जीवन के अंतिम दिनों में कहे गए कुछ मार्मिक कलाम भी प्रस्तुत किए गए, जिन्हें सुनकर श्रोताओं की आंखें नम हो गईं। वक्ताओं ने कहा कि सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी की साहित्यिक और वैचारिक विरासत सदैव जीवित रहेगी तथा उनका नाम उर्दू साहित्य और मनक़बत निगारी के इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
मजलिस के समापन पर मरहूम के ईसाल-ए-सवाब के लिए सामूहिक दुआ की गई। उपस्थित लोगों ने अल्लाह से मरहूम के उच्च दर्जात, मग़फिरत और परिवारजनों, विशेष रूप से सैयद सज्जाद हसनैन ज़ैदी को सब्र-ए-जमील अता करने की दुआ की।
अंत में आयोजकों ने सभी उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मरहूम सैयद अज़हर हसनैन ज़ैदी की धार्मिक, साहित्यिक और सामाजिक सेवाएं हमेशा याद रखी जाएंगी तथा उनका संदेश और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।



