नमाज़-ए-जुमा व ईदैन में सामाजिक जिम्मेदारी और अनुशासन जरूरी : डॉ. रैहान अख्तर

अलीगढ़, 27 मई 2026 (मोहम्मद कामरान)

AMU के धर्म संकाय (फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी) के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रैहान अख्तर ने कहा है कि इस्लाम इबादत के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द, कानून के सम्मान और सार्वजनिक अनुशासन को भी विशेष महत्व देता है। उन्होंने “नमाज़-ए-जुमा व ईदैन : शरीअत, सामाजिक सौहार्द और जिम्मेदाराना व्यवहार” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में मुसलमानों को धार्मिक कर्तव्यों के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नमाज़-ए-जुमा और ईदैन इस्लाम के महत्वपूर्ण धार्मिक प्रतीक हैं, जो उम्मत की एकता, धार्मिक चेतना और सामूहिक जीवन का प्रतीक हैं। हालांकि बढ़ती आबादी, यातायात संबंधी समस्याओं, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण कुछ स्थानों पर बड़े धार्मिक आयोजनों से आम नागरिकों और आवागमन में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

डॉ. रैहान अख्तर ने कहा कि शरीअत-ए-इस्लामी संतुलन, सरलता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देती है। इस्लाम दूसरों को कष्ट पहुँचाने या सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करने की अनुमति नहीं देता, बल्कि शांति, संतुलन और आपसी सम्मान की शिक्षा देता है।

उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि जुमा और ईदैन के अवसर पर अनुशासन बनाए रखें, प्रशासनिक निर्देशों का सम्मान करें तथा स्थानीय मस्जिदों, ईदगाहों या वैकल्पिक स्थानों पर शांतिपूर्ण तरीके से नमाज़ अदा करें।

उन्होंने कहा कि यदि किसी बड़ी जामा मस्जिद या केंद्रीय ईदगाह में पर्याप्त स्थान उपलब्ध न हो तो मोहल्लों की मस्जिदों और स्थानीय ईदगाहों में नमाज़ अदा करना शरीअत के अनुसार अधिक उपयुक्त और बेहतर तरीका है। इबादत का मूल उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता, आध्यात्मिक सुधार और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देना है।

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